Classical · 1800–1851 · दिल्ली – दिल्ली
मोमिन ख़ान मोमिन दिल्ली के शायर और ग़ालिब तथा ज़ौक़ के समकालीन थे, जो अपनी ग़ज़लों की रूमानी और निजी तीव्रता के लिए प्रसिद्ध थे। पेशे से हकीम और ज्योतिषी, उनके शेर — जिनकी ग़ालिब ने भी प्रशंसा की — आज भी ख़ूब उद्धृत किए जाते हैं।
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
असर उस को ज़रा नहीं होता
रंज राहत-फ़िज़ा नहीं होता
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
उल्फ़त का जब नतीजा दीदार हो गया
अब हुस्न-ओ-इश्क़ दोनों का ऐतबार हो गया
मर गए हम जो ग़ैर की सुनी
हिज्र में इज़्तिराब किस को था
रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का दिल भी मेरी तरह
उम्र सारी तो कटी इश्क़-ए-बुताँ में मोमिन
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे
शब जो मस्जिद में जा फँसा मोमिन
रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के