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उर्दू और हिन्दी शायरी का जीवंत संग्रह — मुफ़्त, खुला, तीन लिपियों में।

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© 2026 मीरास · एक खुला संग्रह

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता

मिर्ज़ा ग़ालिब

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नज़र नहीं आती

मिर्ज़ा ग़ालिब

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और

मिर्ज़ा ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ

मिर्ज़ा ग़ालिब

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

मिर्ज़ा ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

मिर्ज़ा ग़ालिब

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मिर्ज़ा ग़ालिब

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो

हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो

मिर्ज़ा ग़ालिब

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही

मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही

मिर्ज़ा ग़ालिब

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

अल्लामा इक़बाल

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं

अल्लामा इक़बाल