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उर्दू और हिन्दी शायरी का जीवंत संग्रह — मुफ़्त, खुला, तीन लिपियों में।

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© 2026 मीरास · एक खुला संग्रह
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मीरास
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میراث

वो कविता जो आपको विरासत में मिली। वो शे'र जो आप सँभालते हैं।

दक्षिण एशियाई कविता का एक जीवंत संग्रह — दोहे से ग़ज़ल तक, मीर से महादेवी तक।

आज का चयन

आज का चयन

दिल

हृदय, मन

म

मिर्ज़ा ग़ालिब

Classical · 1797–1869

मुग़ल काल के अंतिम दौर के महान उर्दू और फ़ारसी शायर, अपनी ग़ज़लों के लिए विख्यात।

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब
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इस सप्ताह संग्रह में जोड़े गए शे'र।

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब
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जिन आवाज़ों के पास हम लौटते हैं

वे कवि-जीवन जिन्होंने आज हम जो पढ़ते हैं उसे आकार दिया।

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म

मिर्ज़ा ग़ालिब

Classical · 1797–1869

मुग़ल काल के अंतिम दौर के महान उर्दू और फ़ारसी शायर, अपनी ग़ज़लों के लिए विख्यात।

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अ
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इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता

मिर्ज़ा ग़ालिब

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नज़र नहीं आती

मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता

मिर्ज़ा ग़ालिब

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नज़र नहीं आती

मिर्ज़ा ग़ालिब

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और

मिर्ज़ा ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ

मिर्ज़ा ग़ालिब

अल्लामा इक़बाल

Classical · 1877–1938

कवि-दार्शनिक, जिनकी उर्दू और फ़ारसी शायरी ने आध्यात्म को आत्म-बोध की दृष्टि से जोड़ा।

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अ

अमीर ख़ुसरो

Classical · 1253–1325

उर्दू/हिन्दवी कविता के जनक — तेरहवीं सदी के बहुश्रुत कवि जिन्होंने फ़ारसी और दिल्ली की बोली को गीत में पिरोया।

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ज

जिगर मुरादाबादी

Modern · 1890–1960

रूमानी ग़ज़ल के उस्ताद, जिनकी मुशायरों की अदायगी ने उन्हें जीवनकाल में ही दंतकथा बना दिया।

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