ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार
जो उतरा डूब गया, जो डूबा सो पार
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
उर्दू/हिन्दवी कविता के जनक — तेरहवीं सदी के बहुश्रुत कवि जिन्होंने फ़ारसी और दिल्ली की बोली को गीत में पिरोया।
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आ शैख़ गफ़तग्वे परेशाँ पे तो न जा
मस्ती में अब तो क़िबला-ए हाजात हो गई
भाषा की आरंभिक आवाज़ अठारहवीं सदी के उस्ताद से मिलती है।
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
भाषा की आरंभिक आवाज़ अठारहवीं सदी के उस्ताद से मिलती है।