ख़ुशामद
मसोलीनी
दाम तहज़ीब
ये मदरसा ये खेल ये ग़ोग़ाये र्वारो
जो आलम ईजाद में है साहब ईजाद
रोमी बदले शामी बदले बदला हनदसतान
ज़ाग़ कहता है निहायत बदनमा हैं तेरे पर
वही जवाँ है क़बीले की आँख का तारा
जिस के परतव से मुनव्वर रही तेरी शब दोश
ला देनी व लातीनी किस पेच में उलझा तो
फ़ितरत के मक़ासद की करता है निगहबानी
बढे बलोच की नसीहत बीटे को
दगरगों आलम शाम व सहर कर
ख़िरद देखे अगर दिल की निगह से
पानी तिरे चश्मों का तड़पता हुआ सीमाब
निकल कर ख़ानक़ाहों से अदा कर रस्म शबीरी
समझा लहू की बूँद अगर तो उसे तो ख़ैर
निशाँ यही है ज़माने में ज़िंदा क़ोमों का
हज़रत इंसान