पार भी हो न कलीजे के तो फिर क्या बुलबुल
मसर नाला जिगर कावी है गो मौज़ूँ है
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
अठारहवीं सदी के अग्रणी उर्दू शायर, जिन्हें "ख़ुदा-ए-सुख़न" कहा जाता है।
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