यही है तो ज़िंदगी से कौन डरता है
मगर क्या कीजिये ग़म-ए- तो बस यही है
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
लखनऊ के तीखे मूर्तिभंजक, जिन्होंने अपनी आवाज़ को ग़ालिब की छाया के सामने खड़ा किया।
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इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का