आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं
महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
ग़म के शायर, जिनकी ग़ज़लें पीड़ा को ही एक प्रकार का संगीत बना देती हैं।
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