दिल को सुकून-ए-वस्ल मुयस्सर नहीं तो क्या
उस याद-ए-हिज्र में भी मज़ा है कभी कभी
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
"इंक़लाब ज़िंदाबाद" के रचयिता, जिन्होंने स्वतंत्रता-सेनानी की आग को कोमलतम ग़ज़ल से जोड़ा।
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