चुपके चुपके दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना है
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
"इंक़लाब ज़िंदाबाद" के रचयिता, जिन्होंने स्वतंत्रता-सेनानी की आग को कोमलतम ग़ज़ल से जोड़ा।
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अब इस के बाद सुबह है और सुबह-ए-नौ मजाज़
हम पर है ख़त्म शाम-ए-ग़रीबान-ए-लखनऊ