शब-ए-फ़िराक़ की तन्हाइयों में याद आया
वो एक शख़्स जो बेताब कर गया था कभी
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
लखनऊ शैली के सह-संस्थापक, जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल की भाषा को परिष्कृत और मँजवाया।
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