लिपटती है धुआँ बन के ये आह-ए-दिल-ए-ज़ार
मिरे निकलते ही घर से चराग़ बुझते हैं
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
लखनऊ शैली के संस्थापक उस्ताद, जिनकी ग़ज़लें शिल्प को फ़क़ीराना विरक्ति से जोड़ती हैं।
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