सहर होने को है ऐ शमा-ए-मज़ार
अब तो रो ले कि ये मौक़ा न मिलेगा
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
अठारहवीं सदी के क़सीदा और व्यंग्य के उस्ताद, शास्त्रीय उर्दू शायरी के स्तंभ।
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