लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले
पृष्ठभूमि
शायर के बारे में
अंतिम मुग़ल दरबार के राजकवि और बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद।
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