Contemporary · भोपाल
अमन राही मीरास बीज के लिए रचे गए एक काल्पनिक समकालीन शायर हैं; उनका कलाम मूल सामग्री है जो किसी जीवित शायर की रचना के बजाय सार्वजनिक डोमेन में रखी गई है। उन्हें एक यायावर की आवाज़ के रूप में कल्पित किया गया है — राहों, श्रम और छोटी कृपाओं पर छोटी, सहज ग़ज़लें और नज़्में। वे संग्रह को बिना किसी कॉपीराइट पाठ के समकालीन रूपों को दर्शाने में मदद करते हैं।
मैं एक मुसाफ़िर हूँ मेरी मंज़िल कोई नहीं
हर राह मेरी है और हर घर मेरा नहीं
दिन भर की मेहनत के बाद जब रोटी नज़र आती है
तो मज़दूर के हाथों में पूरी कायनात आती है
किसी भूखे को खिला दो तो ख़ुदा मिल जाता है
ये इबादत हर मस्जिद हर मंदिर से बड़ी है
रात को जब सड़कें सोती हैं मैं जागता हूँ
शायद कोई मुसाफ़िर अभी तक राह में है
हर सुबह एक नई उमीद ले के आती है
थक के बैठा हूँ मगर हारा नहीं हूँ मैं
मेरे पास देने को सिर्फ़ दो बातें हैं
थोड़ा सा दर्द और थोड़ी सी मोहब्बत
राह के साथी मिल जाएँ तो सफ़र आसान लगता है
अकेला चलने वाला हर मंज़िल को दूर पाता है
दिल को इतना न बोझल कर ऐ मेरी ज़िंदगी
थोड़ा सा ग़म भी काफ़ी है जीने के लिए