इस शहर-ए-दक्खन की हर गली में
एक छुपा है दिलकशी में
बोलो तो में मिठास आए
चुप हो तो निगाह में उदासी में
हर शेर है जैसे मौसम-ए-गुल
हर लफ़्ज़ बसा है ज़िंदगी में
ये शहर वली का मस्कन है
यहीं जान बसी है शायरी में
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ऐतबार खोती है
देखना हर सुबह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मुझ दिल-ए-बीमार का