शराब-ए-शौक़ सें सरशार हैं हम
कभू बे-ख़ुद कभू हुशियार हैं हम
दो-रंगी सूँ तिरी ऐ सर्व-ए-रा'ना
कभू राज़ी कभू बेज़ार हैं हम
तिरे तस्ख़ीर करने में सिरीजन
कभी नादाँ कभी अय्यार हैं हम
तेरे नयन की आरज़ू में
कभू सालिम कभी बीमार हैं हम
'वली' वस्ल-ओ- सूँ सजन की
कभू सहरा कभू गुलज़ार हैं हम
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ऐतबार खोती है
देखना हर सुबह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मुझ दिल-ए-बीमार का