शग़्ल बेहतर है -बाज़ी का
क्या हक़ीक़ी ओ क्या मजाज़ी का
हर ज़बाँ पर है मिस्ल-ए-शाना मुदाम
ज़िक्र तुझ ज़ुल्फ़ की दराज़ी का
आज तेरी भवाँ ने मस्जिद में
होश खोया है हर नमाज़ी का
गर नईं राज़-ए- सूँ आगाह
फ़ख़्र बेजा है फ़ख़्र-ए-राज़ी का
ऐ 'वली' सर्व-क़द को देखूँगा
वक़्त आया है सरफ़राज़ी का
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ऐतबार खोती है
देखना हर सुबह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मुझ दिल-ए-बीमार का