छुपा हूँ मैं सदा-ए-बाँसुली में
कि ता जाऊँ परी-रू की गली में
न थी मुझे आने की लेकिन
ब-ज़ोर-ए-आह पहुँचा तुझ गली में
अयाँ है रंग की शोख़ी सूँ ऐ शोख़
बदन तेरा क़बा-ए-संदली में
जो है तेरे दहन में रंग ओ ख़ूबी
कहाँ ये रंग ये ख़ूबी कली में
किया जियूँ लफ़्ज़ में मअ'नी सिरीजन
मक़ाम अपना -ओ-जान-ए-'वली' में
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ऐतबार खोती है
देखना हर सुबह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मुझ दिल-ए-बीमार का