यादश-ब-ख़ैर जब वो तसव्वुर में आ गया
शे'र ओ शबाब ओ का दरिया बहा गया
जब अपने मरकज़-ए-असली पे आ गया
ख़ुद बन गया हसीन दो आलम पे छा गया
जो दिल का राज़ था उसे कुछ दिल ही पा गया
वो कर सके बयाँ न हमीं से कहा गया
नासेह फ़साना अपना हँसी में उड़ा गया
ख़ुश-फ़िक्र था कि साफ़ ये पहलू बचा गया
अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल
हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया
दिल बन गया निगाह निगह बन गई ज़बाँ
आज इक सुकूत-ए-शौक़ क़यामत ही ढा गया
मेरा कमाल-ए-शेर बस इतना है ऐ 'जिगर'
वो मुझ पे छा गए मैं ज़माने पे छा गया
Responses
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ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है