शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए
ऐ मर्हबा वो यहाँ तक तो आ गए
पर हज़ार तरह के औहाम छा गए
ये तुम ने क्या किया मिरी दुनिया में आ गए
सब कुछ लुटा के राह-ए-मोहब्बत में अहल-ए-दिल
ख़ुश हैं कि जैसे दौलत-ए-कौनैन पा गए
सेहन-ए-चमन को अपनी बहारों पे नाज़ था
वो आ गए तो सारी बहारों पे छा गए
अक़्ल ओ जुनूँ में सब की थीं राहें जुदा जुदा
हिर-फिर के लेकिन एक ही मंज़िल पे आ गए
अब क्या करूँ मैं फ़ितरत-ए-नाकाम-ए-इश्क़ को
जितने थे हादसात मुझे रास आ गए
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है