-ए-फ़िराक़ है और नींद आई जाती है
कुछ इस में उन की तवज्जोह भी पाई जाती है
ये उम्र-ए- यूँही क्या गँवाई जाती है
हयात ज़िंदा हक़ीक़त बनाई जाती है
बना बना के जो दुनिया मिटाई जाती है
ज़रूर कोई कमी है कि पाई जाती है
हमीं पे इश्क़ की तोहमत लगाई जाती है
मगर ये शर्म जो चेहरे पे छाई जाती है
ख़ुदा करे कि हक़ीक़त में ज़िंदगी बन जाए
वो ज़िंदगी जो ज़बाँ तक ही पाई जाती है
गुनाहगार के दिल से न बच के चल ज़ाहिद
यहीं कहीं तिरी जन्नत भी पाई जाती है
न सोज़-ए-इश्क़ न बर्क़-ए-जमाल पर इल्ज़ाम
दिलों में आग ख़ुशी से लगाई जाती है
कुछ ऐसे भी तो हैं रिंदान-ए-पाक-बाज़ 'जिगर'
कि जिन को बे-मय-ओ-साग़र पिलाई जाती है
Responses
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ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है