सभी अंदाज़-ए- प्यारे हैं
हम मगर सादगी के मारे हैं
उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ
जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं
ऐ सहारों की वालो
कितने इंसान बे-सहारे हैं
लाला-ओ-गुल से तुझ को क्या निस्बत
ना-मुकम्मल से इस्तिआ'रे हैं
हम तो अब डूब कर ही उभरेंगे
वो रहें शाद जो किनारे हैं
शब-ए-फ़ुर्क़त भी जगमगा उट्ठी
अश्क-ए-ग़म हैं कि माह-पारे हैं
आतिश-ए-इश्क़ वो जहन्नम है
जिस में फ़िरदौस के नज़ारे हैं
वो हमीं हैं कि जिन के हाथों ने
गेसू-ए-ज़िंदगी सँवारे हैं
हुस्न की बे-नियाज़ियों पे न जा
बे-इशारे भी कुछ इशारे हैं
Responses
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ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है