को बे-नक़ाब होना था
आप अपना जवाब होना था
मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था
बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था
तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
हाँ मुझी को ख़राब होना था
आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले
हो चुका जो इताब होना था
कूचा-ए- में निकल आया
जिस को ख़ाना-ख़राब होना था
मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते
ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब होना था
दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगा-रंग
उस को सादा किताब होना था
हम ने नाकामियों को ढूँड लिया
आख़िरश कामयाब होना था
हाए वो लम्हा-ए-सुकूँ कि जिसे
महशर-ए-इज़्तिराब होना था
निगह-ए-यार ख़ुद तड़प उठती
शर्त-ए-अव्वल ख़राब होना था
क्यूँ न होता सितम भी बे-पायाँ
करम-ए-बे-हिसाब होना था
क्यूँ नज़र हैरतों में डूब गई
मौज-ए-सद-इज़्तिराब होना था
हो चुका रोज़-ए-अव्वलीं ही 'जिगर'
जिस को जितना ख़राब होना था
Responses
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ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है