गया रौनक़-ए-हयात गई
गया सारी काएनात गई
दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र
लब तक आई न थी कि बात गई
दिन का क्या ज़िक्र तीरा-बख़्तों में
एक रात आई एक रात गई
तेरी बातों से आज तो वाइ'ज़
वो जो थी ख़्वाहिश-ए-नजात गई
उन के बहलाए भी न बहला दिल
राएगाँ सई-ए-इल्तिफ़ात गई
मर्ग-ए-आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन
इक मसीहा-नफ़स की बात गई
अब जुनूँ आप है गरेबाँ-गीर
अब वो रस्म-ए-तकल्लुफ़ात गई
हम ने भी वज़-ए-ग़म बदल डाली
जब से वो तर्ज़-ए-इल्तिफ़ात गई
तर्क-ए-उल्फ़त बहुत बजा नासेह
लेकिन उस तक अगर ये बात गई
हाँ मज़े लूट ले जवानी के
फिर न आएगी ये जो रात गई
हाँ ये सरशारियाँ जवानी की
आँख झपकी ही थी कि रात गई
जल्वा-ए-ज़ात ऐ मआ'ज़-अल्लाह
ताब-ए-आईना-ए-सिफ़ात गई
नहीं मिलता मिज़ाज-ए-दिल हम से
ग़ालिबन दूर तक ये बात गई
क़ैद-ए-हस्ती से कब नजात 'जिगर'
मौत आई अगर हयात गई
Responses
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ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है