प्यास की कैसे लाए ताब कोई
नहीं तो हो सराब कोई
ज़ख़्म-ए- में जहाँ महकता है
इसी क्यारी में था गुलाब कोई
रात बजती थी दूर शहनाई
रोया पी कर बहुत शराब कोई
दिल को घेरे हैं रोज़गार के ग़म
रद्दी में खो गई किताब कोई
कौन सा ज़ख़्म किस ने बख़्शा है
इस का रक्खे कहाँ हिसाब कोई
फिर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की
आने वाला है फिर अज़ाब कोई
शब की दहलीज़ पर शफ़क़ है लहू
फिर हुआ क़त्ल आफ़्ताब कोई
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