ये जो के ऐवानों में इक हलचल इक हश्र बपा है
ये जो अंधेरा सिमट रहा है ये जो उजाला फैल रहा है
ये जो हर दुख सहने वाला दुख का मुदावा जान गया है
मज़लूमों मजबूरों का ये जो मिरे शे'रों में ढला है
ये जो महक गुलशन गुलशन है ये जो चमक आलम आलम है
मार्कसिज़्म है मार्कसिज़्म है मार्कसिज़्म है मार्कसिज़्म है
Responses
No comments yet. Be the first to respond.