Progressive · 1928–1993 · होशियारपुर – लाहौर
हबीब जालिब सड़क के लिए लिखते और सड़क पर पढ़ते थे। "दस्तूर" — "मैं नहीं मानता" — जैसी नज़्मों के लिए बार-बार जेल गए, जो हर आमरियत को ठुकराती थीं। उनकी सादा ज़बान एक सोची-समझी सियासत थी — ऐसी शायरी जो अनपढ़ भी फ़ौरन थाम ले। 1993 में लाहौर में मुफ़लिसी में इंतक़ाल हुआ; उनकी नज़्में आज भी एहतिजाज की आवाज़ हैं।
कोई शाइर नहीं मिला।