है फैली हुई काली घटाओं की जगह
बद-दुआएँ हैं लबों पर अब दुआओं की जगह
इंतिख़ाब-ए-अहल-ए-गुलशन पर बहुत रोता है
देख कर ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न को ख़ुश-नवाओं की जगह
कुछ भी होता पर न होते पारा-पारा जिस्म-ओ-जाँ
राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह
लुट गई इस दौर में अहल-ए-क़लम की आबरू
बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह
कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा
ग़ैर होते काश 'जालिब' आश्नाओं की जगह
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