ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ
यकायक अज़ दो चश्म जादू ब-सद-फ़रेबम ब-बुर्द तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियाँ
चूँ शम-ए-सोज़ाँ चूँ ज़र्रा हैराँ ज़ मेहर-ए-आँ-मह बगश्तम आख़िर
न नींद नैनाँ न अंग चैनाँ न आप आवे न भेजे पतियाँ
ब-हक़्क़-ए-आँ मह कि रोज़-ए-महशर ब-दाद मारा फ़रेब 'ख़ुसरव'
सपीत मन के दुराय राखूँ जो जाए पाऊँ पिया की खतियाँ
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ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार
ख़ुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग
तन मोरा मन पी का दोनों भए एक रंग
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस
चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस
ज़िहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहो काहे लगाये छतियाँ
अपनी छब बनाय के जो मैं पी के पास गई
जब छब देखी पी की तो अपनी भूल गई
बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी