ये रीत अनोखी है सब जग से न्यारी प्रेम की
जो डूब गया सो पार उतरा ख़ुमारी प्रेम की
नज़र मिली तो सारा भुला बैठे
इक सी लगा गई चिंगारी प्रेम की
न नींद आए न चैन आए न क़रार आए
अजब बिमारी है ये बिमारी प्रेम की
जिसे लगी है वही जाने इस का मोल
कोई बताए क्या क़ीमत हमारी प्रेम की
कहे ख़ुसरो कि मैं तो बिक गया उस दर पे
लुटा के होश-ओ-ख़िरद सारी प्रेम की
ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार
ख़ुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग
तन मोरा मन पी का दोनों भए एक रंग
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस
चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस
ज़िहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहो काहे लगाये छतियाँ
अपनी छब बनाय के जो मैं पी के पास गई
जब छब देखी पी की तो अपनी भूल गई
बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी