ये आरज़ू थी तुझे के रू-ब-रू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते
पयाम-बर न मुयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ
ज़ुबान-ए-ग़ैर से क्या शरह-ए-आरज़ू करते
मेरी तरह से मह-ओ-मेहर भी हैं आवारा
किसी हबीब की ये भी हैं जुस्तुजू करते
जो देखते तेरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम
असीर होने की आरज़ू करते
गुज़र गया वो ज़माना कहूँ तो किस से कहूँ
ख़याल-ए-यार से इंशा हम आबरू करते
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं
बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते
इंशा जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
वहशी को सुकून से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या
सौदा-ए-इश्क़ में हम ने क्या क्या न सहे सदमे
फिर भी दिल-ए-नादाँ को आराम नहीं आया
दिल मिल गए हैं इस तरह एक दूसरे के साथ
अब हम जुदा हो भी तो ये दिल जुदा नहीं
रोज़ ये बात सुना करते हैं लोग
दिल लगाना कोई आसान नहीं