उम्र गुज़री तेरे मिलने की हमें आस रही
हर नफ़स में तेरी सी तेरी बास रही
दूर रहकर भी तू नज़दीक रहा के सदा
इस लिए तुझ से न एक पल भी ये दिल दास रही
चाँद तारों से मिला लेते थे हम दिल का पता
रात भर महफ़िल-ए-ग़म की यही रास रही
सब्र के फूल खिले दर्द की इस क्यारी में
तेरे ग़म से मेरे दामन की सदा साँस रही
दिल न हारा वली उम्मीद के इस सेहरा में
तुझ को पाने की सदा इस को तलाश रही
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ऐतबार खोती है
देखना हर सुबह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मुझ दिल-ए-बीमार का