Modern · 1910–1975 · अलीपुर चट्ठा, गुजरांवाला – लंदन
नज़र मुहम्मद राशिद — जो हमेशा न. म. राशिद छपे — ने "मावरा" (1940) से उर्दू शायरी का छंदी ढाँचा तोड़ा, जो इस ज़बान की पहली बड़ी आज़ाद नज़्मों की किताब थी। पेशे से संयुक्त राष्ट्र के अफ़सर, उन्होंने तेहरान, न्यूयॉर्क और लंदन से लिखा। बाद के जदीदिये उन्हीं के साये में लिखते हैं।
कोई शाइर नहीं मिला।