Modern · 1852–1933 · लखनऊ – हैदराबाद
सैयद अली हैदर, तख़ल्लुस नज़्म, लखनऊ की अदबी नफ़ासत को निज़ाम के हैदराबाद ले गए, जहाँ उन्होंने पढ़ाया, तर्जुमे किए और लिखा। उनकी "शरह-ए-दीवान-ए-उर्दू-ए-ग़ालिब" आज भी ग़ालिब की सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली शरहों में है; उनकी अपनी ग़ज़लों में वही कड़ा कान दिखता है। ग्रे की "एलेजी" का उनका उर्दू तर्जुमा भी मशहूर है।
कोई शाइर नहीं मिला।