Contemporary · 1945–2021 · हैदराबाद, दक्कन – कराची
नसीर तुराबी, मशहूर ख़तीब रशीद तुराबी के बेटे, कम लिखते और बहुत तराशते थे — एक ही मजमूआ "अक्स-ए-फ़रियादी" उनकी पहचान है। 1971 में ढाका के सुक़ूत पर लिखी ग़ज़ल "वो हमसफ़र था मगर उससे हम-नवाई न थी" दशकों बाद एक टीवी सीरियल के ज़रिए दुनिया भर में मशहूर हुई। वे लुग़त-निगार और ज़बान के आलिम भी थे।
कोई शाइर नहीं मिला।