चा काफ़राना क़मार हयात मी बाज़ी
कि बा ज़माना बसाज़ी बख़ुद नमी साज़ी
दिगर बमदरसा हाये हरम नमी बीनम
जनीद व निगाह ग़ज़ाली व राज़ी
बहकम मफ़ती अज़म कि फ़ितरत अज़लीसत
बदीन सवा हराम असत कार शहबाज़ी
हमां फ़क़ीह अज़ल गुफ़्त जरा शाहीं रा
बासमां गर्वी बा ज़मीं न पर्वाज़ी
मनम कि तौबा न करदम ज़ फ़ाश गोई हा
ज़ बीम अईं कि बसलतां कननद ग़माज़ी
बदसत मा न समरक़नद व ने बख़ारा अईसत
बगो ज़ फ़क़ीरां ब तर्क शीराज़ी
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा