निशाँ यही है ज़माने में ज़िंदा क़ोमों का
कि सुब्ह व शाम बदलती हैं उन की तक़दीरीं
कमाल सिद्क़ व मुरव्वत है ज़िंदगी उन की
मुआफ़ करती है भी उन की तक़सीरीं
क़लनदराना अदाएँ सकनदराना जलाल
ये अमतीं हैं जहाँ में बरहना शमशीरीं
ख़ुदी से मर्द ख़ुद आगाह का व जलाल
कि ये किताब है बाक़ी तमाम तफ़सीरीं
शिकवा ईद का मनकर नहीं हूँ में लेकिन
क़ुबूल हक़ हैं फ़क़त मर्द हर की तकबीरीं
हकीम मेरी न्वाؤं का राज़ क्या जाने
वराये अक़्ल हैं अहल जुनूँ की तदबीरीं
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा