तमाम आरिफ़ व अआमी ख़ुदी से बेगाना
कोई बताए ये मस्जिद है या कि मीख़ाना
ये राज़ हम से छुपाया है मीर वाइज़ ने
कि ख़ुद हरम है हरम का परवाना
तिलिस्म बे ख़बरी काफ़िरी व दीं दारी
हदीस शैख़ व बरहमन फ़ुसून व अफ़्साना
नसीब ख़ता हो या रब वो बनदिया दरवेश
कि जिस के फ़क़्र में अंदाज़ हूँ कलीमाना
छुपे रहें गे ज़माने की आँख से कब तक
गुहर हैं आब वलर के तमाम यक दाना
Responses
No comments yet. Be the first to respond.
जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा