आज़ाद की रग सख़्त है मानिंद रग संग
महकोम की रग नर्म है मानिंद रग ताक
महकोम का मुर्दा व अफ़्सुर्दा व नौमीद
आज़ाद का ज़िंदा व परसोज़ व तरब नाक
आज़ाद की दौलत दिल रौशन नफ़स गर्म
महकोम का सरमाया फ़क़त दीदिया नम नाक
महकोम है बीगानह इख़्लास व मुरव्वत
हर चंद कि मंतिक़ की दलीलों में है चालाक
मुमकिन नहीं महकोम हो आज़ाद का हमदोश
वो बनदिया अफ़्लाक है ये ख़्वाजा अफ़्लाक
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा