ये मेहर व मह ये सितारे ये आसमान कबोद
किसे ख़बर कि ये आलम अदम है या कि वजूद
ख़याल जादा व फ़साना व अफ़्सूँ
कि ज़िंदगी है सरापा रहील बे मक़्सूद
रही न आह ज़माने के हाथ से बाक़ी
वो यादगार कमालात अहमद व महमोद
ज़वाल इल्म व हुनर मर्ग नागहां उस की
!वा कारवाँ का मता गिराँ बहा मसवद
मुझे रलाती है अहल जहाँ की बीदरदी
फ़ुग़ान मुर्ग़ ख़्वाँ को जानते हैं सरोद
न कह कि सब्र में पिन्हाँ है चारिया ग़म दोस्त
न कह कि सब्र ममाये मौत की है कशोद
दले कि आशिक़ व साबर बूद मगर संग असत
ज़ इश्क़ ता ब सबोरी हज़ार फ़रसनग असत
न मुझ से पूछ कि उम्र गुरेज़ पा क्या है
किसे ख़बर कि ये नैरंग व सीमीआ क्या है
हुआ जो ख़ाक से पैदा वो ख़ाक में मसतोर
!मगर ये ग़ीबत सग़री है या फ़ना क्या है
ग़ुबार राह को बख़्शा गया है ज़ौक़ जमाल
ख़िरद बता नहीं सकती कि मुद्दआ क्या है
दिल व नज़र भी असी आब व गुल के हैं एजाज़
नहीं तो हज़रत इंसाँ की इंतिहा क्या है
जहाँ की रूह रवाँ ला इलाह अला व
!मसीह व मीख़ व चलीपा ये माजरा क्या है
क़सास ख़ून तमन्ना का मानगीए किस से
गुनाह गार है कौन और ख़ूँ बहा क्या है
ग़मीं मशो कि ब बंद जहाँ गरफ़तारीम
तिलिस्म हा शकनद आँ दले कि मा दारीम
ख़ुदी है ज़िंदा तो है मौत इक मक़ाम हयात
कि इश्क़ मौत से करता है इम्तिहान सबात
ख़ुदी है ज़िंदा तो दरिया है बे कराना तिरा
तिरे फ़िराक़ में मुज़्तर है मौज नील व फ़रात
ख़ुदी है मुर्दा तो मानिंद काह पेश नसीम
ख़ुदी है ज़िंदा तो सलतान जमला मोजोदात
निगाह एक तजल्ली से है अगर महरूम
दो सद हज़ार तजल्ली तलाफ़ी माफ़ात
मक़ाम बनदिया मोमिन का है वराये सपहर
ज़मीं से ता ब सरीआ तमाम लात व मनात
हरीम ज़ात है उस का नशेमन अबदी
न तीरा ख़ाक लहद है न जल्वा गाह सिफ़ात
ख़ुद आगहां कि अज़ीं ख़ाक दाँ बरों जसतनद
तिलिस्म मेहर व सपहर व सितारा बशकसतनद
Responses
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा