कहा तस्वीर ने तस्वीर गर से
नुमाइश है मिरी तेरे हुनर से
वलीकन किस क़दर ना मुंसिफ़ी है
!का तो पोशीदा हो मेरी से
गिराँ है चश्म बीना दीदा वर पर
!जहां बीनी से क्या गुज़री शरर पर
नज़र व ग़म व सोज़ व तब व ताब
तो ऐ नादाँ क़नाअत कर ख़बर पर
ख़बर अक़्ल व ख़िरद की नात्वानी
नज़र दिल की हयात जावेदानी
नहीं है उस ज़माने की तग व ताज़
सज़ावार हदीस लन तरानी
तो है मेरे कमालात हुनर से
न हो नौमीद अपने नक़्श गर से
मिरे दीदार की है इक यही शर्त
कि तो पिन्हाँ न हो अपनी नज़र से
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा