ये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया दूँ
!साकनान अर्श अज़म की तमनाؤं का ख़ूँ
उस की बरबादी पे आज आमादा है वो कारसाज़
जिस ने उस का नाम रक्खा था काफ़ व नों
में ने दखलाईआ फ़रंगी को मलोकीत का ख़्वाब
में ने तोड़ा मस्जिद व देर व कलीसा का फ़ुसूँ
में ने नादारों को सखलाईआ सबक़ तक़दीर का
में ने मुनइम को दिया सरमाया दारी का जुनूँ
कौन कर सकता है उस की आतिश सोज़ाँ को सर्द
जिस के हनगामों में हो इबलीस का सोज़ दरूँ
जिस की शाख़ें हूँ हमारी आबीआरी से बुलंद
!कोन कर सकता है उस नख़्ल कुहन को सरनगों
उस में क्या शक है कि मोहकम है ये अबलीसी निज़ाम
पुख़्ता तर उस से हुए ख़ू ग़ुलामी में अवाम
है अज़ल से उन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूद
उन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़ बे क़याम
आरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहीं
हो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ाम
ये हमारी सई पैहम की करामत है कि आज
सूफ़ी व मिला मलोकीत के बंदे हैं तमाम
तब मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़ीवन थी
!वरना क़्वाली से कुछ कम तर नहीं इल्म कलाम
है तवाफ़ व हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्या
कनद हो कर रह गई मोमिन की तेग़ बे नियाम
किस की नौमीदी पे हजत है ये फ़रमान जदीद
!हे जहाद उस दूर में मर्द मुसलमाँ पर हराम
ख़ैर है सुल्तानी जम्हूर का ग़ोग़ा कि शर
!तो जहाँ के ताज़ा फ़तनों से नहीं है बा ख़बर
हूँ मगर मेरी जहाँ बीनी बताती है मुझे
!जो मलोकीत का इक पर्दा हो क्या उस से ख़तर
हम ने ख़ुद शाही को पहनाईआ है जमहोरी लिबास
जब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद शनास व ख़ुद नगर
कारोबार शहरीआरी की हक़ीक़त और है
ये वजूद मीर व सुल्ताँ पर नहीं है मनहसर
मज्लिस मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार हो
है वो सुल्ताँ ग़ैर की खीती पे हो जिस की
तो ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहोरी निज़ाम
!चहरा रौशन अनदरों चनगीज़ से तारीक तर
रूह सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराब
है मगर क्या उस यहोदी की शरारत का जवाब
वो कलीम बे तजल्ली वो मसीह बे सलीब
नीसत पीग़मबर व लेकिन दर बग़ल दारद किताब
क्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह पर्दा सोज़
!मशरक़ व मग़रिब की क़ोमों के लिए रोज़ हिसाब
उस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअत का फ़साद
!तोड़ दी बंदों ने आक़ाؤं के ख़ीमों की तनाब
तोड़ उस का रोमा अलकबरे के अईवानों में देख
आल सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाब
कौन बहर रोम की मौजों से है लिपटा हुआ
गाह बालद चूँ सनोबर गाह नालद चूँ रबाब
में तो उस की आक़िबत बीनी का कुछ क़ाइल नहीं
जिस ने अफ़रनगी सियासत को क्या यूँ बे हिजाब
!आए तिरे सोज़ नफ़स से कार आलम उस्तुवार
तो ने जब चाहा क्या हर परदगी को आश्कार
आब व गुल तेरी हरारत से जहान सोज़ व साज़
अबला जन्नत तिरी तालीम से दानाये कार
तुझ से बढ़ कर फ़ितरत आदम का वो महरम नहीं
सादा दिल बंदों में जो मशहूर है परोरदगार
काम था जिन का फ़क़त तक़दीस व तस्बीह व तवाफ़
तेरी ग़ैरत से अबद तक सरनगोन व शर्मसार
गरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहर तमाम
अब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है एतिबार
वो यहोदी फ़ित्ना गर वो रूह मज़दक का बरोज़
हर क़बा होने को है उस के जुनूँ से तार तार
ज़ाग़ दशती हो रहा है हमसर शाहीन व चरग़
कितनी सरत से बदलता है मिज़ाज रोज़गार
छा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअत अफ़्लाक पर
जिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त ग़ुबार
फ़तनह फ़र्दा की हीबत का ये आलम है कि आज
कानपते हैं कोहसार व मरग़ज़ार व जोयबार
मेरे आक़ा! वो जहाँ ज़ेर व ज़बर होने को है
जिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सीआदत पर मदार
है मिरे दस्त तसरफ़ में जहान रंग व बू
क्या ज़मीं क्या मेहर व मह क्या आसमान तो बतो
देख लें गे अपनी आँखों से तमाशा ग़रब व शरक़
में ने जब गरमा दिया अक़्वाम योरप का लहू
क्या अमामान सियासत क्या कलीसा के शीवख़
सब को दीवाना बना सकती है मेरी एक हो
कारगाह शीशा जो नादाँ समझता है उसे
!तोड़ कर देखे तो उस तहज़ीब के जाम व सुबू
दस्त फ़ितरत ने क्या है जिन गरेबानों को चाक
मज़दकी मंतिक़ की सोज़न से नहीं होते रफ़ू
कब डरा सकते हैं मुझ को अशतराकी कोचा गर्द
ये परेशाँ रोज़गार आशुफ़्ता मग़ज़ आशुफ़्ता मू
है अगर मुझ को ख़तर कोई तो उस उम्मत से है
जिस की ख़ाकसतर में है अब तक शरार आरज़ू
ख़ाल ख़ाल उस क़ौम में अब तक नज़र आते हैं वो
करते हैं अश्क सहर गाही से जो ज़ालिम वज़ू
जानता है जिस पे रौशन बातिन अय्याम है
!मज़दकीत फ़ित्ना फ़र्दा नहीं इस्लाम है
जानता हूँ में ये उम्मत हामल क़रां नहीं
है वही सरमाया दारी बंदा मोमिन का दीं
जानता हूँ में कि मशरिक़ की अँधेरी रात में
बे यद बीज़ा है पीरान हरम की आस्तीं
अस्र हाज़िर के तक़ाज़ाؤं से है लेकिन ये ख़ौफ़
हो न जाए आश्कारा शरअ पीग़मबर कहीं
अलहज़र! आईन पीग़मबर से सो बार अलहज़र
हाफ़ज़ नामूस ज़न मर्द आज़मा मर्द आफ़रीं
मौत का पैग़ाम हर नो ग़ुलामी के लिए
ने कोई फ़ग़फ़ोर व ख़ाक़ां ने फ़क़ीर रह नशीं
करता है दौलत को हर आलोदगी से पाक साफ़
मनमों को माल व दौलत का बनाता है अमीं
उस से बढ़ कर और क्या फ़िक्र व अमल का इंक़लाब
!पादशाहों की नहीं अल्लाह की है ये ज़मीं
चश्म आलम से रहे पोशीदा ये आएँ तो ख़ूब
ये ग़नीमत है कि ख़ुद मोमिन है महरूम यक़ीं
है यही बेहतर अलहीआत में उलझा रहे
ये किताब अल्लाह की तावीलात में उलझा रहे
तोड़ डालीं जिस की तकबीरीं तिलिस्म शश जहात
हो न रौशन उस ख़ुदा अंदेश की तारीक रात
अबन मरीम मर गया या ज़िंदा जावेद है
हैं सिफ़ात ज़ात हक़ हक़ से जुदा या ऐन ज़ात
आने वाले से मसीह नासरी मक़्सूद है
या मजदद जिस में हूँ फ़रज़नद मरीम के सिफ़ात
हैं कलाम अल्लाह के अल्फ़ाज़ हादस या क़दीम
उम्मत मरहूम की है किस अक़ीदे में नजात
क्या मुसलमाँ के लिए काफ़ी नहीं उस दूर में
ये अलहीआत के तरशे हुए लात व मनात
तुम उसे बेगाना रखो आलम किरदार से
ता बिसात ज़िंदगी में उस के सब महरे हूँ मात
ख़ैर असी में है क़यामत तक रहे मोमिन ग़ुलाम
छोड़ कर औरों की ख़ातिर ये जहान बे सबात
है वही शेर व तसव्वुफ़ उस के हक़ में ख़ूब तर
जो छुपा दे उस की आँखों से तमाशा हयात
हर नफ़स डरता हूँ उस उम्मत की बेदारी से में
है हक़ीक़त जिस के दीं की अहतसाब काएनात
मस्त रखो ज़िक्र व फ़िक्र सबहगाही में उसे
पुख़्ता तर कर दो मिज़ाज ख़ानक़ाही में उसे
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा