क़ोमों के लिए है मरकज़ से जुदाई
!हो साहब मरकज़ तो ख़ुदी क्या है ख़ुदाई
जो फ़क़्र हुआ तल्ख़ी दौराँ का गिला मंद
उस फ़क़्र में बाक़ी है अभी बू गदाई
उस दूर में भी मर्द को है मयस्सर
जो मजज़ा पर्बत को बना सकता है राई
दर मारका बे सोज़ तो ज़ोक़े नत्वां याफ़त
ऐ बनदिया मोमिन तो कजायी तो कजायी
ख़ुर्शीद ! सरा परदिया मशरिक़ से निकल कर
पहना मिरे कोहसार को मल्बूस हिनाई
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा