मुझ को तो ये दुनिया आती है दगरगों
मालूम नहीं देखती है तेरी क्या
हर सीने में इक सुब्ह क़यामत है नमोदार
अफ़्कार ज्वानों के हुए ज़ेर व ज़बर क्या
कर सकती है बे मारका जीने की तलाफ़ी
ऐ पीर हरम तेरी मुनाजात सहर क्या
मुमकिन नहीं तख़लीक़ ख़ुदी ख़ानक़हों से
!आस शोला नम ख़ुर्दा से टूटे गा शरर क्या
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा