ला देनी व लातीनी किस पेच में उलझा तो
दारो है ज़ईफ़ों का लाग़ालब अला व
सय्याद मआनी को योरप से है नौमीदी
दलकश है फ़ज़ा लेकिन बे नाफ़ा तमाम आहू
बे अश्क गाही तक़्वीम ख़ुदी मुश्किल
ये लाला पीकानी ख़ोशतर है कनार जो
सय्याद है काफ़िर का नख़चीर है मोमिन का
ये देर कुहन यानी बतख़ाना रंग व
ऐ शैख़ अमीरों को मस्जिद से नकल्वा दे
है उन की नमाज़ों से मेहराब तरश अबरू
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा