वही जवाँ है क़बीले की आँख का तारा
शबाब जिस का है बे दाग़ ज़र्ब है कारी
अगर हो जंग तो शीरान ग़ाब से बढ़ कर
अगर हो सलह तो राना ग़ज़ाल तातारी
अजब नहीं है अगर उस का सोज़ है हमा सोज़
कि नीस्ताँ के लिए बस है एक चिंगारी
ने उस को दिया है शिकवा सुल्तानी
कि उस के फ़क़्र में है हीदरी व करारी
कम से न देख उस की बे कुलाही को
ये बे कुलाह है सरमाया कुलह दारी
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा