तीनत में फ़रोमाईह नहीं मिस्ल हवस
पर शहबाज़ से मुमकिन नहीं पर्वाज़ मगस
यूँ भी दस्तूर गुलिस्ताँ को बदल सकते हैं
कि नशेमन हो अनादल पे गिराँ मिस्ल क़फ़स
आमादा नहीं मुंतज़िर बानग रहील
!हे कहाँ क़ाफ़िला मौज को पर्वाये जरस
गरचे मकतब का जवाँ ज़िंदा नज़र आता है
मुर्दा है माँग के लाया है फ़रंगी से नफ़स
परवरिश दिल की अगर मद्द नज़र है तुझ को
!मरद मोमिन की निगाह ग़लत अंदाज़ है बस
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा