ये मदरसा ये खेल ये ग़ोग़ाये र्वारो
उस ऐश फ़रावां में है हर लहज़ा नौ
वो इल्म नहीं ज़हर है अहरार के हक़ में
जिस इल्म का हासिल है जहाँ में दो कफ़ जो
नादाँ ! अदब व फ़ल्सफ़ा कुछ चीज़ नहीं है
अस्बाब हुनर के लिए लाज़िम है तग व दो
फ़ितरत के न्वामीस पे ग़ालिब है हुनर मंद
शाम उस की है मानिंद साहब परतव
वो साहब फ़न चाहे तो फ़न की बरकत से
!टपके बदन मेहर से शबनम की तरह ज़ो
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा