ला कर बरहमनों को सियासत के पेच में
ज़नारीवं को देर कुहन से निकाल दो
वो फ़ाक़ा कश कि से डरता नहीं ज़रा
रूह मोहम्मद उस के बदन से निकाल दो
फ़िक्र अरब को दे के फ़रंगी तख़ीलात
इस्लाम को हिजाज़ व यमन से निकाल दो
अफ़ग़ानीवं की ग़ैरत दीं का है ये इलाज
मिला को उन के कोह व दमन से निकाल दो
अहल हरम से उन की रिवायात छीन लो
आहू को मरग़ज़ार ख़ुतन से निकाल दो
इक़बाल के नफ़स से है लाले की तेज़
ऐसे ग़ज़ल सरा को चमन से निकाल दो
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जो में सर ब सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम आश्ना तुझे क्या मिले गा नमाज़ में
कभी जो आवारा-ए जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसीं गे
बरहना पाई वही रहे गी मगर नया ख़ार ज़ार होगा
सुना दिया गोश मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर
जो अहद सहरायीवं से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा
दयार मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र कम अय्यार होगा
कहा जो क़ुमरी से में ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा ब गुल हैं
तो ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा
न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सर रह गुज़ार बैठा सितम कश इंतिज़ार होगा